Constitution Of India, Part-4, Article - 36 to 51 (भाग ४- राज्य की नीति के निदेशक तत्व)

 भारत का संविधान 


हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष ,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा समस्त नागरिंकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, 

विचार, अभिव्यक्ति, विश्चास, धर्म 

और उपासना की स्वतंत्रता, 

प्रतिष्ठा और अवसर की समता 

प्राप्त कराने के लिए, 

तथा उन सब में व्यक्ति की गरीमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढाने के लिए

दृढसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज  २६ नवम्बर, १९४९ ई ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हाजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और  आत्मार्पित करते हैं|



भाग ४-  राज्य की नीति के निदेशक तत्व


*अनुच्छेद (आर्टीकल )- ३६, ३७, ३८, ३९, ४०....५१



अनुच्छेद ३६ :-

परिभाषा:- इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, "राज्य" का वही अर्थ है जो भाग ३ में है |



अनुच्छेद ३७ :-

इस भाग में अंतर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना:- इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे कितु फिर भी इनमें अधिकथित तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्त्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा |



अनुच्छेद ३८:- 

राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा :-

(१) राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, अर्थिक  और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्रणित करे, भरसक प्रभावी रुप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा |

(२) राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों कें बीच बल्कि विभिन्न क्षेंत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोंगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ३९ :- 

राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्त्व :-

राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रुप से:-

(क) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रुप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो ;

(ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रुप से साधन हो ;

(ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससें धन और उत्पादन साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संक्रेद्रण न हो ;

(घ)  पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो;

(ड)  पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिको को ऐसें राजगारों में न जाना  पडे जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो ;

(च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और अर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए |


(३९-क). समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता :- राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति सें न:शुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा |



अनुच्छेद ४० :-

 ग्राम पंचायतों का संगठन:- राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जा उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रुप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हो |



अनुच्छेद ४१ :-

कुछ दशाओे  में काम, शिक्षा और लो सहायता पाने का अधिकार :- राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओे  के भीतर, काम  पाने के, शिक्षा पाने के और  बेकारी, बुढापा, बीमारी और  न:शत्कत तथा अन्य अनर्ह अभाव की दीशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा |



अनुच्छेद ४२ :-

 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओें का सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा |



अनुच्छेद ४३ :- 

कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि :- राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और  अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार वा बढाने का प्रयास करेगा |

(४३-क). उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना:- राज्य किसी उद्योग में लगें हूए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनो के प्रबंध में  कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से कदम उठाएगा |

(४३-ख). सहकारी सोसाइटियों  का संवर्धन :- राज्य, सहकारी सोसाइटियों की स्वैच्छिक विरचना, उनके स्वशासी कार्यकरण, लोकतांत्रिक नियंत्रण और वृत्तिक  प्रबंधन का संवर्धन करने का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ४४ :- 

नागरिकों  के लिए एक समान सिविल संहिता :-  राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिको  के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने  का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ४५ :- 

छह वर्ष  से कम आयु के बालकों के लए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख रेख और शिक्षा का उपबंध :- राज्य सभी  बालकों के लिए छए वर्ष की आयु पूरी करने तक, प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ४६ :-

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गो के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अ‍िभिवृद्धि :- राज्य, जनमा के दुर्बल वर्गो के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा |



अनुच्छेद ४७:-

पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने  तथा लोक स्वास्थ का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य :- राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया , मादक  पेयों और  स्वास्थ्य के लिए  हनिकारक औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ४८:-

 कृषि और पशुपालन का संगठन :- राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछडों तथा अन्य दुधारु और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा |

(४८-क). पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा :-

राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा |



अनुच्छेद ४९:-

राष्ट्रीय महत्त्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण :-(संसद् द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन) राष्ट्रीय महत्त्व वाले (घोषित किए गए) कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुचि वाले प्रत्येक संस्मारक या स्थान या वस्तु का, यथास्थिति, लुंठन, विरुपण, विनाश, अपसारण, व्ययन या निर्यात से संरक्षण करना राज्य की बाध्यता होगी |



अनुच्छेद ५०:-

कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण:- राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा |



अनुच्छेद ५१:-

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि :- राज्य,-

(क) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,

(ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और स्म्मानपूर्ण संबंधो को बनाए रखने का,

(ग) संगठित लोगो के एक दूसरें से व्यवहारों में अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढांने का, और

(घ) अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्यस्थम् द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहान देने का, प्रयास करेगा |


*भाग ४-क*

मूल कर्तव्य


(५१-क). मूल कर्तव्य :- 

भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह :-

 (क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे ;

(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को ह्रदय में संजोए रखे और उनका पालन करे ;

(ग) भारत की प्रभुता, एकता और  अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे ;

(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे ;

(ड) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और  प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है ;

(च) हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्त्व समझे और उसका परिरक्षण करें ;

(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी  और वन्य जीव है, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे ;

(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;

(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे ;

(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले ;

(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक  या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे |


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